Wednesday, December 11, 2019

निशुल्क विधिक सहायता



निशुल्क विधिक सहायता

  समाज के हर व्यक्ति को न्यायिक। प्रणाली में न्याय प्राप्त करने का अधिकार है और हमारे संविधान के अनुच्छेद 39 a भी गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगो को निशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करवाता है 

लेकिन आज भी बहुत से लोग न्याय के लिए कोर्ट का सहारा इस लिए नही ले पाते क्योकि उन्हें इन सभी का ज्ञान नही है और उन्हें अपने अधिकारों का भी ज्ञान नही है और इस कारण वे अन्याय को सहन करते रहते हैं,

 लेकिन विधिक जागृति एवं सामाजिक विकास संस्थान असहाय, गरीब, पिछड़ी महिला, बच्चो, बुजुर्गो को निशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करवाने और उन्हें न्याय मिले इस हेतु जयपुर, राजस्थान में लगातार कार्यरत हैं ।

 यदि आप जयपुर शहर के निवासी हैं या जयपुर शहर में रहते हैं औऱ आपके साथ या आपके आसपास किसी असहाय या कमजोर के साथ कोई अन्याय हो रहा है, या आप वकील करने में असमर्थ है, या किसी नाबालिक बच्चे से अवैध रूप से कार्य करवाया जा रहा है तो आप विधिक जागृति संस्था से संपर्क करे हमारी संस्था आपकी हरसंभव सहायता करेगी औऱ आपको निशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करवाएगी।

कौन कौन व्यक्ति विधिक सहायता पाने का हकदार है:-
1. वह व्यक्ति जो जयपुर शहर का निवासी हैं या जयपुर में रह रहा है।

2. वह व्यक्ति जो मानव दुर्व्यवहारों से या बेगारों से सताया गया है।

3. स्त्री या बालक है।

4. मानसिक रूप से अस्वस्थ या अन्यथा असमर्थ है।

5. वह व्यक्ति जो अनापेक्षित अभाव जैसे बहु-विनाश, जातीय हिंसा, अत्याचार, बाढ़-सूखा, औद्योगिक विनाश की दशाओं के अधीन सताया हुआ है, या 

6. कोई औद्योगिक कर्मकार या,

7. अभिरक्षा में है जिसके अंतर्गत अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 के अंतर्गत किसी संरक्षण गृह में या किशोर मनश्चिकित्सीय अस्पताल परिचर्या गृह में रखा गया व्यक्ति 

8. जिसकी आर्थिक स्थिति  अधिवक्ता नियुक्त करने की नही हो ।

कार्यालय
B-14, क्रिस्टल मॉल, बनीपार्क, जयपुर
मनीष दिनकर, मोबाईल-9314102016
महासचिव, विधिक जागृति संस्था
राजेश शर्मा, मोबाईल-9024884869

Sunday, December 8, 2019

सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत अब बेटे के साथ ही बहू और दामाद को भी बुजुर्ग की देखभाल के लिए जिम्मेदार बनाया गया है

सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत अब बेटे के साथ ही बहू और दामाद को भी बुजुर्ग की देखभाल के लिए जिम्मेदार बनाया गया है

जिन बुजुर्गो के इकलौते बेटे या बेटी का निधन हो गया या लापता हो गये उन बुजुर्गो की समाज मे उपेक्षा होती है और उनकी बहू या दामाद ना तो उनकी सेवा करते ना ही मेंटिनेंस देते और उन बुजुर्गो के समक्ष दर दर ठोकरे खाने के अलावा और कोई विकल्प नही था।

इस परेशानी को सरकार के संज्ञान में लाये जाने पर सरकार ने सीनियर सिटिजन ऐक्ट 2007 के तहत बुजुर्गों का ख्याल रखने वालों की परिभाषा में विस्तार करते हुए बच्चो के साथ ही बहू और दामाद को भी शामिल किया और बुजुर्ग की देखभाल और भरणपोषण के लिए जिम्मेदार बताया है।

मेंटिनेंस ऐंड वेलफेयर ऑफ पैरंट्स ऐंड सीनियर सिटिजन ऐक्ट 2007 में बदलाव का प्रस्ताव के मुताबिक, दामाद और बहु पर भी होगी अपने सास-ससुर की देखभाल की जिम्मेदारी।

 अकेले रह रहे बुजुर्गों का सम्मान भी सुनिश्चित होगा

घर में अकेले बुजुर्गों की जिम्मेदारी सिर्फ बेटे ही नहीं, बल्कि बहू-दामाद, सौतेले बच्चों की भी होगी। 

 बुजुर्गों की देखभाल की परिभाषा तय करने वाले मेंटिनेंस ऐंड वेलफेयर ऑफ पैरंट्स ऐंड सीनियर सिटिजन ऐक्ट 2007 में  माता-पिता और सास-ससुर को भी शामिल किया गया है, चाहे वे सिनियर सिटिजन हों या नहीं। 

मेंटिनेंस ऐंड वेलफेयर ऑफ पैरंट्स ऐंड सीनियर सिटिजन ऐक्ट 2007 में अधिकतम 10 हजार रुपये मेंटिनेंस देने की सीमा को भी खत्म करने का प्रावधान शामिल हैं।

आदेश की पालना नही होने पर उन्हें 6 महीने कैद की सजा हो सकती है, जो अभी तीन महीने है। 

देखभाल की परिभाषा में भी बदलाव कर इसमें घर और सुरक्षा भी शामिल किया गया है।

 देखभाल के लिए तय की गई राशि का आधार बुजुर्गों, पैरंट्स, बच्चों और रिश्तेदारों के रहन-सहन के आधार पर किया जाएगा।

 इसका मकसद बुजुर्गों के शारीरिक और मानसिक कष्ट में कमी आएगी और उनका सम्मान बढेगा। 

संशोधन में 'सीनियर सिटीजन केयर होम्स' के पंजीकरण का प्रावधान है और केंद्र सरकार स्थापना, संचालन और रखरखाव के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित करेगी।

 बुजुर्गों तक पहुंच बनाने के लिए प्रत्येक पुलिस ऑफिसर को एक नोडल ऑफिसर नियुक्त करना होगा।

Sunday, December 1, 2019

क्या आपके पिता की संपत्ति में आपका अधिकार है?

क्या आपके पिता की संपत्ति में आपका अधिकार है?


भारतीय हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (हिन्दू सक्सेशन एक्ट) , 1956 में सम्पति के अधिकार का उल्लेख किया गया है कि उत्तराधिकारी कोन होगा किसका कितना हक रहेगा और उत्तराधिकार का क्रम क्या रहेगा इसी अनुसार संम्पति का विभाजन होता है यदि पिता का स्वर्गवास बिना वसीयत किये हो जाता है तो एक बेटे बेटी एवं पत्नी का अपने पिता/पति की स्वार्जित संपत्ति पर वारिस के रूप में पहला अधिकार होता है और उसी अनुपात में संपत्ति का विभाजन होता है यदि पुत्रो या पुत्रियों में से किसी का निधन हो जाता है तो उसके बच्चो का पिता की समाप्ति में अन्य हिस्सेदार के अनुरूप ही (पिता के हिस्से अनुसार )हिस्सा रहेगा एवं पिता के निधन के पश्चात उनकी पत्नी द्वारा अपने हिस्से की वसीयत, बेचान, गिफ्ट, हकत्याग नही किया है तो वह संपत्ति पुत्र और पुत्रियों में बराबर विभाजित होगी।

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पैतृक संपत्ति के मामले में

हिंदू कानून के अनुसार, एक व्यक्ति को जन्म के साथ ही पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से का अधिकार मिल जाता है। पैतृक संपत्ति वह होती है जो पुरुष वंश की चार पीढ़ियों को विरासत में मिलती है। संपत्ति को दो शर्तों के आधार पर पैतृक माना जाता है - अगर पिता को उनके पिता से, मतलब दादा  से उनके देहांत के बाद विरासत में मिली हो ; या दादा के जीवित होते हुए भी उनके पैतृक संपत्ति का बँटवारा करने से विरासत में मिली हो । अगर पिता को संपत्ति दादा से उपहार के रूप में ली हो, तो वह पैतृक संपत्ति नहीं मानी जाती है।

बेटा अपने पिता  के जीवित रहते हए भी पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा माँग सकता  है। किसी भी सूरत में, आवेदक को संपत्ति में अपने हिस्से पर हक़ साबित करना होता है। हालाँकि, अधिनियम सौतेले बेटे ( माता-पिता के मृतक साथी या किसी दूसरे साथी का बेटा, या इस तरह के कुछ मामलों में ) को पहला वारिस नहीं मानता।  

कुछ मामलों में, अदालत सौतेले बेटे को पिता की प्रॉपर्टी विरासत में लेने की अनुमति देती है। उदाहरण के लिए, बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा संबोधित एक मामले में, आवेदक एक मृत हिंदू महिला का उसके पहले पति से बेटा था। महिला को अपने दूसरे पति से प्रोपर्टी विरासत में मिली थी,  जिसका उसकी पत्नी के अलावा कोई वैध वारिस नहीं था। अदालत ने सौतेले बेटे के दावे को सही ठहराया और घोषित किया कि एक महिला की मृत्यु के बाद, उसका बेटा - दूसरे पति का सौतेला बेटा - संपत्ति पर अपने उत्तराधिकार का दावा कर सकता है। यह फैसला तब लिया गया जब दूसरे मृतक पति के भतीजों और भतीजों के बेटों ने संपत्ति पर अपना हक जताया था।
खुद की कमाई संपत्ति के मामले में

कानून के हिसाब से एक बेटे का अपने माता-पिता की खुद से कमाई संपत्ति पर कानूनी अधिकार नहीं होता है। हालाँकि, वह अपना हिस्सा माँग सकता है अगर वह संपत्ति बनाने में अपना सहयोग साबित कर दे । इसके अलावा, एक बेटे के लिए माता-पिता की खुद से कमाई संपत्ति में हिस्सा पाने का कोई मौका नहीं होता है अगर उसके पिता ने अपनी वसीयत में संपत्ति किसी और को दी हो, या दस्तावेज़ बनाकर भेंट दी हो। उसके माता- पिता उसे संपत्ति का इस्तेमाल करने दे सकते हैं लेकिन माता- पिता पर इसके लिए कोई दवाब नहीं होगा। इसके अलावा, पोते का उसके दादा की खुद से कमाई संपत्ति  पर कोई अधिकार नहीं होता है।

अगर पिता संपत्ति उपहार में दें

एक संपत्ति को पैतृक संपत्ति नहीं माना जाता है अगर वह पिता ने अपने बेटे को उपहार में दी हो। इसलिए, एक व्यक्ति अपने दादा के द्वारा पिता को उपहार में दी गई संपत्ति में अपने हिस्से का दावा नहीं कर सकता । ऐसी संपत्ति जो बेटे या बेटी को पिता से उपहार के रूप में मिली हो, वह उनकी खुद से कमाई संपत्ति बन जाती है। ऐसे मामलों में, पोते/पोतियों का ऐसी संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार नहीं होता जिसे उनके दादा ने अपने बेटे या बेटी को उपहार में दी हो, जो वे किसी और व्यक्ति को भी दे सकते थे। जब तक दादा इसे अपनी इच्छा से पैतृक संपत्ति नहीं बनाते तब तक ऐसी संपत्ति को खुद  से कमाई हुई संपत्ति माना जा सकता है।क्या आपके पिता की संपत्ति में आपका अधिकार है?

Saturday, November 23, 2019

Will कैसे बनाये




Will कैसे बनाये
वसीयत को इच्छा पत्र भी कहा जाता हे, और आपके स्वामित्व कि सम्पति आप किसे देना चाहते हे यह आपकी इच्छा पर निर्भर करता है, इस कारण यह जरुरी हों जाता है कि आपकी अंतिम इच्छा पूर्णतया स्पष्ट हो ताकि आपकी मृत्यु पश्चात आपकी चल-अचल संपत्ति आप जिसे देना चाहते है वह उसका बिना किसी भय बाधा के उपयोग कर सके इसके लिए आवश्यक है कि वसीयत बड़ी सावधानी और सम्पूर्ण क़ानूनी आधारो पर निष्पादित होनी चाहिए उसमे आपकी सम्पति का स्पष्ट विवरण दर्ज हो, आपकी इच्छा का स्पष्ट विवरण दर्ज हो
वसीयत एक विधिक दस्तावेज है जिसमें विलकर्ता द्वारा अपनी चल - अचल संपत्ति अपने विधिक उत्तराधिकारी या अन्य आपके नजदीकी व्यक्ति में बांटी जाती है।
वसीयतकर्ता को यह अधिकार होता है कि वह अपने जीवनकाल में कभी भी वसीयत को निरस्त कर सकता है या नई वसीयत निष्पादित कर सकता है लेकिन यह ध्यान रखने योग्य है कि यदि आप द्वारा पूर्व में वसीयत निष्पादित करी हुई है और आपने जिसके हक में वसीयत करी और आपका उसे अपनी सम्पति देने का मन बदल गया या आपके अनुरूप आचरण नहीं कर आपको हैरान परेशान कर रहा है तो नई वसीयत में पूर्व कि वसीयत को निरस्त करने का कारण अवश्य दर्ज करे
वसीयत करने का सबसे मह्त्वपूर्ण लाभ आपकी मृत्यु पश्चात आपके विधिक वारिसान के मध्य आपकी सम्पति का राजी ख़ुशी बटवारा, कोर्ट केस से मुक्ति और आपकी सम्पति का  आपकी इच्छा अनुसार उपयोग
वसीयत के लिए यह बिल्कुल जरुरी नहीं कि वह आपके वारिसों के हक में ही कि जाये आप अपनी संपत्ति किसी मंदिर,धार्मिक संस्था, सामजिक संस्था, या किसी को भी जरिये वसीयत दे सकते है
वसीयत बनाने सबंधी कानून Indian succession Act 2(b) वसीयत को define करता है। वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति का बंटवारा कैसे करना चाहता है तथा उनका वारिस कौन होगा।

जिन चीजों की वसीयत हो सकती है-

व्यक्ति खुद की कमाई किसी भी चल अचल संपत्ति की वसीयत कर सकता है।
मुस्लिम धर्म के अलावा हर भारतीय पर भारतीय उत्तराधिकारी अधिनियम 1925 लागु होता है।


वसीयत करने का तरीका

पहले के समय में हम सयुक्त परिवार में रहते थे और हमारे बुर्जुग अपनी इच्छा सादे कागज पर लिख दिया करते थे या मौखिक अंतिम इच्छा बता दिया करते थे लेकिन आज के समय में कोई किसी पर विश्वास नहीं करता और ही किसी के पास इतना समय है कि वो आपकी मर्त्यु पश्चात आपके परिवार का विवाद निपटाने के लिए अपना समय जाया करे इसलिए जरुरी है कि आपकी वसीयत आप किसी भी रजिस्ट्रार कार्यालय में रजिस्टर्ड करवाए और उसके गवाह भी ऐसे हो जो आपकी मर्त्यु पश्चात होने वाले विवाद में गवाह बन कर आपकी अंतिम इच्छा/ वसीयत के सम्बन्ध में गवाही दे सके या मध्यस्त बन सके।

वसीयत कौन बना सकता है

वसीयतकर्ता का मानसिक संतुलन सही हो, वह सोचने समझने कि स्थिति में हो, जिस सम्पति कि वसीयत निष्पादित कर रहा है उसे करने का अधिकार हो, किसी नशे पते या दबाव में नहीं हो और वसीयत के हर शब्द का अर्थ उसे पता हो

वसीयत बनाते समय ध्यान देने योग्य बातें

यदि आप नहीं वसीयत बना रहे हो तो उसमें यह दर्ज करें कि आपके द्वारा बनाई गई पुरानी वसीयत को आप रद्द कर रहे हैं। बनाई गई वसीयत को रजिस्टर्ड कराना आवश्यक नहीं होता परंतु मृत्यु के बाद वसीयत में कोई गड़बड़ी ना हो इसके लिए वसीयत registered कराई जा सकती है। गवाहों के साथ सबरजिस्ट्रार के ऑफिस वसीयत को रजिस्टर्ड करवाया जा सकता है। वसीयत करने के बाद उसमें हस्ताक्षर, अंगूठे का निशान तथा दो गवाहों के हस्ताक्षर करने होंगे। पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिन लोगों को आप वसीयत कर रहे हैं वह गवाह नहीं बन सकते। वसीयत करने वाले पहले यदि वसीयत पाने वाले की मृत्यु हो जाती है तो वसीयत दुबारा बनानी होती है।

किस-किस चीज की कर सकतें हैं वसीयत
आप अपनी खुद की कमाई हुई अचल संपत्ति, जैसे जमीन, मकान, दुकान, खेत आदि की भी वसीयत कर सकते हैं। वहीं जो संपति आपके नाम है, उसी की ही वसीयत की जा सकती है।

गवाह की मौत होने पर क्या करें।
अगर वसीयत करने वाले से पहले किसी गवाह की मौत हो जाए तो वसीयत दोबारा बनवानी चाहिए।

वसीयत किसी भी language में किया जा सकता है